Monday, January 2, 2012

क्या जश्न-ए-मुहब्बत थी, क्या हाल-ए-ज़माना.
ख़ामोशियों में अपनी आवाज़ बुलंद थी.
कुछ ख्वाब मेरे टूटे, कुछ ख़ाक ग़ुज़र थे,
शीशे के टुकडों जैसे हम बिखर चुके थे.
थे तन्हा और अकेले, कोई साथ भी न था,
वीरानियों में रहते सब साज़ दफन थे.
हर दम पे दम ना निकला, हर पल में ना मरे,
पर क्यूं हैं अब भी ज़िंदा ये राज़ दफन है.


-अनुराग जैन