Thursday, December 15, 2011

मैं तेरे बिन भी जी लूंगा

तू छोड दे मेरा साथ अगर, मैं तेरे बिन भी जी लूंगा.
लम्हा-लम्हा कटे ना रात मगर, मैं तेरे बिन भी जी लूंगा.

तेरे साथ अगर मैं जीता तो, मेरा जीवन सुख से भर जाता.
तेरे साथ अगर जी पाता तो, मैं तन्हा तन्हा ना रोता.
अब बेकाबू जज़्बात हुए, मैं तेरे बिन भी जी लूंगा.
तू दूर सही मेरी जान मगर, मैं तेरे बिन भी जी लूंगा.
तू दूर है मुझसे आज मगर, कल तक तू मेरे पास थी.
है आज बस एक एहसास मगर, कल तक तू बहुत ही खास थी.
अब कहने को ना बात कोई, मैं तेरे बिन भी जी लूंगा.
अब दिल मैं हैं जज़्बात नहीं, मैं तेरे बिन भी जी लूंगा.
है प्यार मेरे ही दिल में, तेरे दिल में तो है कुछ भी नहीं.
है दर्द जो मेरे सीने में, तेरे पास है उसकी झलक नहीं.
है तन्हाई बस साथ मगर, मैं तेरे बिन भी जी लूंगा.
अब है आंखों में आंसू पर, मैं तेरे बिन भी जी लूंगा.
कोई भी ना है साथ मगर, मैं तेरे बिन भी जी लूंगा.
कैसे भी हों हालात मगर, मैं तेरे बिन भी जी लूंगा.

एक आम आदमी की प्रेम कहानी

मैं हूँ एक आम आदमी. आदमी, जिसका कभी कुछ नहीं हो सकता. जो कायर है और हर पल डरता है. कभी दूसरों से, कभी अपने आप से तो कभी ज़माने से. जब भी किसी आम आदमी में जज़्बा हो, वो खास बन सकता है. मगर मैं कभी खास आदमी न बन सका. मैं हमेशा रहा वही, घिसा-पिटा ‘आम आदमी’. खैर अब मुद्दे की बात पर आते हैं. यहाँ मैं चर्चा करने जा रहा हूँ मेरी प्रेम कहानी की. एक ऐसी प्रेम कहानी जो मेरे लिये इतिहास है और शायद आपके लिये चर्चा का विषय.
हाँ तो कहानी शुरु होती है एक भरे पूरे हाट बाज़ार से. मैं इस शहर में नया नया आया था. कुछ 15-17 साल पुरानी बात होगी. उस वक़्त कुछ जवानी का जोश था और कुछ नयी नयी नौकरी का रौब. बस अपनी ही मस्ती में चले जाते थे. ना ज़माने का डर और ना कल की फिक्र. लगता था कि ज़माना अपनी मुट्ठी में है. आखिर क्यूं ना होता, शहर के बडे साहब के दफ्तर में छोटा बाबू जो था. मज़ाल किसी कि जो अपनी और आंख उठा के देख ले. मगर फिर भी कोई तो कमी थी. मां-बाबूजी बचपन में ही गुज़र गये थे. चाचा-चाची ने ही मेरे हिस्से कि खेती के बदले मुझे पढाया था. और मेरी नौकरी लगते ही उन्होने अपने बच्चों का वस्ता देकर मेरे नाम की ज़मीन अपने नाम करवा ली. खैर मुझे उस से तो कोई मतलब रह नहीं गया था. आखिर मुझे खेती तो करनी नहीं थी. मैं अब तो ‘बाबूजी’ हो गया था न गांव के लोगों के लिये. पूरे गांव के लिये सम्मान का पात्र होना बहुत गर्व की बात थी. एक बिन मां-बाप का बच्चा अब शहर जा कर एक बहुत बडा आदमी बन गया था.
ओह मगर मैं भी कितना बेवकूफ हूँ. अपनी प्रेम कहानी बताने चला था और अपनी व्यक्तिगत कहानी बताना शुरू कर दिया. खैर मैं कह रहा था कि कहानी शुरू होती है एक हाट बाज़ार से. हाट बाज़ार, जहाँ आज मेरी शामें अक्सर बीता करती हैं, घर के लिये मोल भाव करते हुए. जहाँ मेरी महीने की तन्ख्वाह का एक बडा हिस्सा जाता है. उसके साथ ने मेरी पूरी दुनिया बदल दी थी. हाँ तो हम उस हाट बाज़ार में थे. वहीं हमारी पहली मुलाक़ात हुई थी. एक सब्जी की दुकान पर. मोल-भाव करते, बस यूं ही मिल गये थी हम. वो एक स्कूल में अध्यापिका थी. कुल जमा एक हज़ार में ही पूरे परिवार का खर्चा चलता था. आखिर थी तो वो भी आम औरत. परिवार भी तो काफी बडा था, उसके चार छोटे भाई बहन थे. बाकी मां-बाप के नाम पर दो बूढे कंकाल थे. पहले पहल हमारी तकरार हो गई थी वो भी इस बात पर के मैने रौब जमा कर सब्जी वाले से कुछ सब्जी ज्यादा डलवा ली थी. बस इसी बात पर अध्यापिका महोदया ने मुझे डांट दिया था. अब भला बडे साहब का छोटा बाबू कैसे किसी अदनी सी मास्टरनी की डांट कैसे सुन सकता था. बस वहीं से बात आगे बढ गई बडे अफसर साहब के छोटे बाबू ने उसे अपने दफ्तर में तलब कर दिया. हालांकि बाद में मुझे लगा कि कहीं मैने कुछ गलत तो नहीं कर दिया मगर फिर से अपना वो रुबाब याद आ गया.
खैर, जब उसे तलब कर ही दिया, तो उसे आना ही पडा. मगर वो बेचारी बनकर ना आई थी. वो आई थी मुझे डांटने. कहने लगी क्या इसीलिये सरकारी बने हो कि गरीबों पर अपना रौब झाड सको. वो ये कहकर चली गई मगर मुझे उस वक़्त बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई. बाद में दफ्तरी लोगों से पता चला कि इसके दादा भी सरकारी अफसर थे. घर में पैसा भी बहुत था. मगर बाप की आदतों में सब बर्बाद हो गया. सुनकर बडा अफसोस हुआ. और मैंने सोचा कि मुझे माफी मांगने जाना चहिये.
जब घर पहुंचा तो पता चला ये नारी किस तरह अपने परिवार का ध्यान रखती है. वहाँ पहुंचते ही सबसे पहले तो मुझे नमस्कार किया गया. दोनों छोटी बहनें खाना बना रही थीं और छोटे भाईयों में से एक पिता की सेवा कर रहा था और दूसरा चूल्हे के लिये लकडी काट रहा था. ये महोदया वहाँ भी शांत नहीं बैठी थी. अब ये पडोस के कुछ बच्चों को पढा रहीं थी. खैर मुझे देख कर उन बच्चों की तो छुट्टी हो गई और वो बहार निकल गये. मुझे बिठाने के लिये एक खाट बिछाई गई और ये नीचे बैठ गई. मैं कुछ कहता इसके पहले ही इन महोदया ने बोलना शुरू कर दिया. कहने लगी “शायद आपको मेरा इस तरह बोलना बुरा लगा हो मगर ये मेरी मजबूरी थी. अगर मैं कुछ ना बोलती तो शायद आप और आपके दफ्तर के बाकी लोग मुझे बहुत डांटते. तो मुझे बचने का और कोई उपाय ना मिला और मैं अपनी बात बोल कर वहां से निकल आई.” उसकी बात सुनकर मैं तो अचम्भित था और उसकी साफगोई से मैं प्रभावित था. चूंकि मैंने भी अपने मां-बाबूजी के जाने के बाद कुछ अभावों का सा जीवन व्यतीत किया था. मगर मेरा वो अभाव इतना भी अभावित नहीं था, जैसा कि मैंने यहाँ देखा. आखिर मेरे पास तो मेरे चाचा-चाची थे, जो किसी मुश्किल की घडी में मेरा साथ दे देते थे. मगर ये तो सभी न केवल एक दूसरे का बल्कि अपने माता-पिता का भी ध्यान रखते थे. उस दिन के बाद तो मेरा आना जाना बढ गया. कभी हाट बाज़ार से ही हम साथ चले जाते, कभी उसके घर कुछ राशन का सामान ले जाता, तो कभी शाम को उसके पडोस के बच्चों को पढाने मे उसकी मदद कर देता. बस वक़्त यूं ही गुज़र रहा था. अब तो मुझे उसके साथ की आदत सी हो गई थी. अगर उसे ना देखता तो कुछ अजीब सा लगने लगता. खैर, एक दिन मैंने ये बात उसे भी बता दी. अब भला मैं कोई फिल्मी हीरो तो था नहीं जो किसी विचित्र प्रकार से उसे अपने दिल की बात कहने की कोशिश करता. बहरहाल, मैंने कह तो दिया था मगर दिल में एक अजीब सी बैचेनी हो रही थी. अगर उसने कुछ गलत मतलब निकाल लिया या उसने मुझे यहाँ आने से मना कर दिया तो मैं क्या करुंगा और भी बहुत कुछ. वैसे मनुष्य का मस्तिष्क कुछ ज्यादा ही तेज चलता है. ये सब कुछ मैंने उन चंद पलों में सोच लिया, जब मैंने उसे ये बात कही थी. वो कुछ पल शांत रही. ये कुछ पल मेरे लिये कई बरसों के समान गुजरे. इन बरसों की खामोशी के बाद उसने कहा. सुनो, मैं जानती हूँ कि तुम मुझसे कितना प्यार करते हो, मगर मेरे लिये ये तब तक सम्भव नहीं होगा, जब तक मेरे छोटे भाई बहनों की मैं व्यवस्था ना कर दूं. मैंने भी जवाब दिया, कि मैं तुम्हारा तब तक इंतजार करूंगा. और जब भी तुम थक जाओगी, तो मुझे अपने सहारे के रूप में पाओगी.
इसी तरह कुछ महीने और बीत गये. हम वैसे ही मिलते रहे. मगर शायद हमारा साथ रहना ईश्वर को मंज़ूर नहीं था. शीघ्र ही मेरा स्थानांतरण दूसरे जिले में हो गया और हम दोनों अलग हो गये. जब में स्टेशन पर जा रहा था, तो वो मुझे आखिरी विदा देने आई. उसकी आंखों में आंसू थे. पता नहीं वो एक प्रेमी की विदाई के आंसू थे, एक दोस्त की विदाई के आंसू थे या फिर केवल एक मददगार की विदाई के आंसू थे. मगर ये स्पष्ठ था कि उसकी आंखों में आंसू थे. जब ट्रैन चलने को तैयार हो गई थी, तो मैंने फिर से उससे एक वादा कर लिया. वादा कि मैं सदा उसका इंतज़ार करूंगा और सदा के लिये उसी का बना रहूंगा.
वक़्त यूं ही गुजरता रहा. हमारा पत्र व्यवहार चलता रहा. शुरू में हर सप्ताह दो पत्र आते थे. धीरे-धीरे पत्रों की संख्या कम होने लगी. पहले सप्ताह में एक, फिर दो सप्ताह में एक और फिर एक समय ऐसा भी आया कि कई कई दिन इंतजार करने के बाद भी उसका कोई पत्र नहीं आता था. वैसे तो गलती मेरी भी थी. मैं स्वयम् भी कई बार उसे पत्र का जवाब नहीं दे पाता था. अलबत्ता हाँ उसे हर महीने कुछ रुपये ज़रूर भेज दिया करता था. मगर जैसे-जैसे पत्रों की संख्या में कमी आई, मेरे पैसे भेजने में भी कमी आने लगी. मगर उसने कुछ भी ना कहा. उसने तो कभी पैसे मांगे भी नहीं थे. खैर, वक़्त यूं ही आगे बढता रहा. मगर जैसा कि मैंने पहले ही कहा था, कि मैं एक आम आदमी हूँ, मैं धीरे-धीरे अपने नये माहोल में रमने लगा. अब उसकी याद की उतनी महत्ता नहीं रह गयी थी. फिर अब दफ्तर की भी कुछ जिम्मेदारियां मुझ पर आने लगी थीं. तो मेरे पास अब उसे याद करने का समय ही नहीं बचा था. अब तो पत्रों का आदान प्रदान भी यदा-कदा ही हो पाता था. अब मुझे एक जीवन संगिनी की कमी खलने लगी. हाँ मैं मानता हूँ कि मैने उससे वादे किये थे. मगर मैंने ये पहले ही कहा कि मैं एक आम आदमी हूँ. मैं ज्यादा देर तक कुछ याद नहीं रख पाता हूँ. मेरे दफ्तर में ही जो बडे बाबू थे, उन्होने अपनी कन्या से विवाह का प्रस्ताव मेरे सामने रखा और मैंने हाँ कह दिया. साथ ही उन्होने मुझे रहने के लिये एक घर का भी इंतजाम कर दिया. मुझे उनके इस प्रस्ताव से बहुत खुशी हुई. विवाह अगले महीने में होना तय हुआ. सभी खुश थे. मगर मैंने उसे इस बारे में कोई खबर नहीं भेजी. हाँ जब मेरे पुराने दफ्तर के लोग मिले तो वो बता रहे थे कि उसने अपनी एक छोटी बहन की शादी कर दी है और उसका एक भाई कहीं मुनीम का काम करने लगा है. उसके माता-पिता भी अब तक गुजर चुके थे. सुनकर बडा अफसोस हुआ. खैर ये सब मुझे मेरी शादी वाले दिन ही पता चला. मगर आखिर हूँ तो मैं एक आम आदमी हूँ, केवल अपने भले की ही सोच सकता हूँ. तो फिर कैसे उसके बारे में सोच सकता हूँ.
धीरे-धीरे मैं भी अपने घर ग्रहस्थी में रम गया और उसे भूलने लगा. अगले ही साल मेरी एक प्यारी सी बेटी हुई. उसके दो साल बाद ही मेरे परिवार में एक प्यारा सा बेटा भी हुआ. मैं उसे भूलने लगा. अब कुछ ना बचा था मेरे दिल में उसके लिये. समय को गुज़रते देर कहाँ लगती है. मेरी पदोन्नती भी हो गई. अब मैं बडा बाबू बन गया था. अब जब बडा बाबू बन गया तो स्थानांतरण तो होना ही था. और किस्मत में वापस उन्ही गलियों में घूमना लिखा था जहाँ से मैंने नौकरी की शुरूआत की थी.
पिछले महीने जब यहाँ वापस आया, तो सभी पिछली यादें ताज़ा हो गई. और ताज़ा हो गई वो स्मृतियां, जो मैंने यहाँ अर्जित की थीं. यहाँ आते ही सबसे पहले तो अपने परिवार के रहने का इंतज़ाम किया, और उसके तुरंत बाद में उसके घर की ओर पहुंचा, पहले पहल तो उन गलियों को ढूंढ ही नहीं पाय. बाद में पता चला वो जगह तो 10 साल पहले ही बिक गई थी. अब उस कच्ची बस्ती की जगह एक बडी अमीरों की बस्ती बन गयी है. मन ये सोच कर बहुत उदास हो गया कि उसके साथ न जाने क्या हुआ होगा. दफ्तर में भी सभी लोग नये ही थे. तो उसके बारे में किसी से कोई समाचार भी न मिल सका. खैर हूँ तो एक आम आदमी, आगे इस बारे में सोचना ही छोड दिया. कुछ दिनों बाद हमारे शहर में मुख्यमंत्री साहब का दौरा होना था. उस दौरे की तैयारियां होने लगीं. मुख्यमंत्री साहब अपनी पार्टी की मीटिंग में और साथ ही एक अनाथ बच्चों के एक कार्यक्रम में शरीक़ होने आ रहे थे. उनके आगमन की तैयारियों में मुझे भी शरीक़ होना था. सभी तैयारियां ज़ोरों पर चल रही थीं. उनकी पार्टी की मीटिंग शांति से खत्म हो गयी. अगला कार्यक्रम अनाथ बच्चों का था. ये कार्यक्रम उन बच्चों के लिये कुछ धनराशि जमा करने के लिये रखा गया था. कार्यक्रम शुरू करने के लिये उस अनाथालय की संस्थापिका जी जब मंच पर आयीं तो मेरे दिल की धडकनें जैसे रुक सी गयीं. हाँ..! ये वही थी. वही जोश और जिजीविशा उसमें आज भी थी. वो अपने आपको आम से खास तक ले जा चुकी थी और मैं अब भी वही था. एक आम आदमी. जिसे न अपने प्रेम पर भरोसा था और न अपने आप पर. जो अपने वादे तक ना पूरे कर सका. हाँ..! मैं एक आम आदमी हूँ. वो आम आदमी, जो डरता है, ज़माने से और अपने आप से. मैं उससे किये वादे तोड कर आज बहुत ही अदना महसूस कर रहा था. और मैंने सोच लिया था कि आज ही अपने स्थानंतरण की दरख्वास्त दे दूंगा. इसलिये, मैं चला आया, उसी हाट बाज़ार में, जहाँ मैं उसे पहली बार मिला था. मेरे पहले प्यार को. यही है मेरी यानि एक आम आदमी की प्रेम कहानी.

प्रेम कहानी

स्त्री धरती की तरह होती है, शांत, स्थिर मगर उसके भीतर क्या है, ये उसका कोई करीबी भी नहीं बता सकता है. सच है ना.
मैं भी मिला था एक बहुत खास स्त्री से. वो भी तो धरती की तरह ही थी. बिल्कुल शांत. मगर क्या ये ज्ञातव्य नहीं है कि कभी कभी धरती में भी भूचाल आता है. बस यही बात तो थी उसमें. वो थी तो धरती मगर भूचाल के बाद की धरती. शांत, मगर अस्त-व्यस्त. फिर भी कुछ तो बात थी उसमें जो मेरी नज़र उस पर अटक गई. ना जाने क्यूं उस भूचाल के बाद वाली धरती के साथ ही रह जाने को दिल कर रहा था. मगर ऐसा नहीं है के ये पहली नज़र में ही हो गया था. पहली नज़र में तो मुझे लगा था आखिर ये मुझे क्यूं मिली. आखिर यही मुझे क्यूं मिली. शांत ज़रूर थी वो मगर केवल बाहर से. भीतर तो अभी भी लावा भरा था. गर्म लावा, जो सब कुछ खत्म कर देना चाहता था. जैसे जीवन उसे पसंद ही नहीं था. जैसे नफरत हो गई थी उसे ज़िंदगी से. जैसे कुछ मिला जुला रूप हो, दर्द, गुस्से और डर का. हाँ ऐसी ही तो थी वो. फिर मैं उसे मिला, या कहो वो मुझे मिली. एक ही बात लगती है ना, मगर ये दोनो अलग अलग बातें हैं. हालांकि पसंद हम दोनो ही एक दूसरे को नहीं करते थे, मगर कुछ तो बात थी जो हम दोनों को जोडती थी, और वो थी हमारा काम. सुनकर हास्यस्पद लगता है, मगर आखिर इसी वजह से तो हम एक दूसरे को जान सके. यही तो वो तंतु था जो हम दोनों में तारतम्य बनाता था. बस इसी बहाने से धीरे-धीरे हम करीब आ रहे थे. बहुत करीब, इतना करीब, कि अब लगता था कि शायद हमें तो मिलना ही था. कुछ तो हो रहा था हमें. या कहूं मुझे. क्युंकि फिलहाल मैं उसके दिल की बात नहीं जानता था. अभी तो बस लग रहा था कि बस हम इसी तरह मिलते रहें,बस यूं ही, दिन भर, देखता रहूँ मैं उसे, बैठे हुए. मगर वो तो मुझे अब भी बच्चा समझती थी. और हाँ शुरुआत में ये सब बचपना ही तो था. हमारे रिश्ते कि शुरुआत तो दोस्ती से ही हुई थी ना. एक नादान सी दोस्ती. बिना किसी मतलब के. ना दुनिया का डर, और ना एक दूसरे का. मगर लोगों को कहाँ पसंद आती है ऐसी दोस्ती. बस वहीं से हमारे बीच तकरार कराने की कोशिशें तेज हो गईं. ऐसी दोस्तियां खास तौर पर कुछ खास उम्र पार कर चुकी औरतों को पसंद नहीं आती हैं. खैर फिर भी हमारी दोस्ती टूट ना सकी. वरन और करीब आते गये हम एक दूसरे के.
कुछ वक़्त और गुज़रा और मेरे जाने का वक़्त करीब आने लगा. मगर शायद वो बेखबर थी, मेरी मुहब्बत से, और मेरी भावनाओं से. मैंने कई बार उसे इशारों में वो सब कहना चाहा, जो लब्जों मे कहने मे शायद सालों लग जाते. मगर वो तो बेखबर थी. जाने कुछ समझना नहीं चाहती थी या कुछ समझ नहीं पा रही थी. आखिर ऐसा क्यूं था कि हमारा इतना गहरा रिश्ता होते हुए भी वो मुझे नहीं समझ पा रही थी. खैर आखिर बडी कोशिशों के बाद, मैंने उसे समझा ही दिया. मगर जवाब में मिली उसकी हंसी ने मेरे होश-ओ-हवास उडा दिये. वो हंसी, जोर से, बहुत जोर से, फिर अचानक चुप हो गई. पूछ्ने लगी, क्या ये वाकई सच है? अगर ये सच है तो मुझे बताओ कि ये कैसे हुआ और क्यूं हुआ...? कुछ देर बाद वो बोली, “सुनो, मैं तुम्हारी बात समझ सकती हूँ, मगर मुझे ये भी पता है कि तुम भी मेरी बात समझोगे. ये किसी भी तरह सम्भव नहीं है. तुम मुझसे छोटे हो, और मैंने तो इस बारे में कभी सोचा भी नहीं था कि ऐसा कुछ हो सकता है.”
अब भला उसे कैसे बतलाता, और समझाता, कि प्यार किसी का इंतज़ार नहीं करता है. ये कोई वजह भी नहीं पूछ्ता है. ये तो बस हो जाता है. काफी दिन बस यूं ही गुजर गये, उसकी हाँ के इंतज़ार में. हालांकि उसने पहले ही कह दिया था, कि वो नहीं चाहती. मगर फिर भी मुझे इंतज़ार था. उसका, और उसकी हाँ का. वक़्त बस यूं ही बीत रहा था. अचानक उसे किसी काम से एक छोटे गांव जाना पडा. गांव तो क्या एक कस्बा था. एक दिन का काम कुछ ज्यादा ही खिंच गया, और उसे वहीं रुकना पड गया. अब रुकने की जगह तो कोई खास थी नहीं उस गांव में, अलबत्ता एक छोटा सा होटल मिल गया. उस रात ना जाने क्यूं मेरा दिल भी बडा बैचैन था. कुछ सूझ ही नहीं रहा था. सोच रहा था, तो बस उसी के बारे में, ना जाने कैसी होगी, कुछ खाया भी होगा या नहीं, और भी ना जाने क्या-क्या. अचानक मेरा मोबाईल बजा, ये उसी का काल था. वो रो रही थी और मेरा दिल बैठा जा रहा था, आखिर क्यूं मैंने उसे अकेला जाने दिया. कुछ पल तो मुझे कुछ महसूस ही नही हुआ. फिर वो बोली उसे डर लग रहा है. तब मेरी जान में जान आई. वो बोली ऐसे में उसे केवल मेरा ही खयाल आया. ना जाने क्यूं ऐसे हालात में भी मुझे खुशी महसूस होने लगी. लगा शायद वो भी मेरे बारे में कुछ वैसा ही सोचती हो. मगर शायद ये मेरा वहम ही था. फिर जैसा मैंने शुरू में ही कहा, औरत धरती की तरह होती है. ऊपर से तो वो भी बडी मजबूत थी, मगर भीतर कहीं कुछ उसके मन में उथल पुथल थी, कोई डर, असुरक्षा, एक अनजाना भरम. उस रात हम दोनों ने तब तक बात की जब तक वो सो नहीं गई. हालांकि मैं ये जानता हूँ कि आज के युवाओं के लिये रात भर बातें करना कोई हैरत की बात नहीं है, मगर मेरे लिये वो थी. क्यूंकि मुझे फोन पर बात करने के मुक़ाबले सामने बैठ कर चुप रहना ज्यादा पसंद है.
खैर वो वक़्त भी गुज़र गया. अब वक़्त आ रहा था मेरे जाने का. लग रहा था, जैसे इस बादल को अब कहीं धरती नसीब ना हो सकेगी, जैसे इस पेढ की जडें काट दी जा रहीं हों, जैसे इस पवन को इसके आधार से हटाया जा रहा हो, जैसे इस आकाश का सम्पर्क काटा जा रहा हो इसकी धरती से. मगर मैं चला गया, उससे दूर, बहुत दूर. फिर भी मुझे आज भी मेरी ज़मीन का इंतज़ार है. इंतज़ार है उसका, वो आये और समेट ले अपने आंचल में मुझे, सर्वस्व, सम्पूर्ण, कुछ ऐसे जैसे मिल जाता है बादल ज़मीन से, किसी बारिश के बाद. कुछ इस तरह हम हो जायें एक दूजे के,जैसे हैं ये धरती और आकाश. सदा के लिये.
मगर अब भी ये ख्वाब मेरे ख्वाब ही हैं. अब भी मैं ये सोचता हूँ, “काश..! ऐसा हो जाये. मैं तुझसे मिल जाऊं, तू मुझसे मिल जाये.”

तेरी याद में

वो वक़्त भी कैसा ज़ालिम था
जब शमा बुझाई थी मैंने

तेरी याद में डूबे-डूबे ही
वो रात बिताई थी मैंने

ना जाने क्यूं तुम चली गई
मुझे छोड के तन्हा राहों में

तब देर शाम से सुबह तक
आंखों में बिताई थी मैंने

तुम

वो बारिश का मौसम, मचलती हवा,
भटकते से हम-तुम चले जा रहे थे.
था भीगा सा तन और बैचैन मन,
दिल में बेताबी ले के चले जा रहे थे.
न तुमने कुछ कहा और न मैंने सुना,
बस वो खामोशियों में ही बतिया रहे थे.
वो मदहोश आलम, वो पागल समां,
थे तो तन्हा, मगर हम चले जा रहे थे.
वो बारिश में गिरकर सम्भलना तेरा,
वो मौसम की रुत सा मचलना तेरा.
वो हिरनी सी आंखें, वो चंचल अदा,
इन्हें साथ ले कर चले जा रहे हैं.

टूटी मदहोशी तो फिर ग़ुमान ये हुआ,
हम थे तन्हा और आंसू बहे जा रहे थे.
न बरिश का मौसम, न मचलती हवा,
तेरी यादों में गुम से हुए जा रहे हैं.
तेरे बिन अब न कुछ भी बाकी रहा,
अब न जाने कैसे हम जिये जा रहे हैं.
है मुझे ये पता, तू यहाँ पर नहीं है,
फिर भी दिल कह रहा ‘तू यहीं है, यहीं है.’
दिल की बेताबियों की सुने जा रहे हैं,
बस तुझे सोच कर ही जिये जा रहे हैं.

तुम्हारी याद में... In your memories

एक और दिन
गुज़र गया
जैसे गुजरे थे
पिछ्ले कुछ दिन
यूं ही,
बैठे हुए
और
सोचते हुए
उन पलों को
जो गुज़ारे
हमने साथ
एक दूसरे के.
वो पल
जिनमें
बदल गयी थी
मेरी ज़िंदगी
वो पल
जब
तुमने छुआ था
मेरे दिल को
मेरी आत्मा को
याद उन पलों की
मेरे दिल में
सदा रहती है
तुम्हें याद करके
मेरि अश्रु नदियां
बहती हैं
तुम्हारे बिन
भला कैसे गुज़ारा होगा
कहो
तुम्हारे सिवा
भला कौन हमारा होगा
शायद तुम मुझे भुला दो
मगर मेरे हृदय में
तुम्हारा प्यार
आज भी है
मुझ पर
उन बीते दिनों का ख़ुमार
आज भी है
कल फिर एक दिन आऐगा
और
वो भी
बस यूं ही गुज़र जाऐगा
जैसे आज का गुज़र,
बैठे हुए
और डूबे हुए
तुम्हारी याद में...

'मेरी तनहाई'--Persistant Lonliness...

ना जाने क्यूं,
कुछ अच्छा महसूस ना हो रहा,
लग रहा, जैसे छूट गया हूँ मैं,
ज़िंदगी की दौड में,
पीछे, बहुत पीछे,
और मेरे साथ है,
केवल मेरी तनहाई,
जो दे रही है साथ मेरा,
हर घडी, हर पल,
मैं कोशिश करूं,
तो भी साथ नहीं छोडती है,
भीड में भी साथ चलती है मेरे,
हर घडी, हर पल, मेरी तनहाई...

ये एक नयी शुरुआत है...

जो भूल चुके हैं 'बिस्मिल' को, 'सुखदेव' को और 'आज़ाद' को,

लगता है उनको भी अब मेरी पुकार सुनाई देती है..

लेकर करवट अब देश मेरा कुछ बदला बदला सा लगता है,

अब आशा और विश्वास की फिर हुँकार सुनाई देती है...



ये एक नई शुरुआत है...

.

जो कदम कभी थम जाते थे उन नेताओं के आने पर

वो कदम आज अब मेरे संग चलने के लिए तैयार हैं

जो साथ कभी चलते चलते पीछे को ही रह जाते थे

अब साथ उन्हे भी लेने का ये वक़्त बहुत माकूल है.

ये एक नयी शुरुआत है...

.

ये देश मेरा था लूटा जब गौरो की कुछ औलादों ने,

तब भारत माँ के पूतों ने उनको बाहर कर डाला था.

अब देश मेरा जो लूटे हैं ये झूठे और मक्कार मनख

इनको भी बाहर करने का संकल्प लिए हम बैठे हैं.

ये एक नयी शुरुआत है...

.

अब वक़्त है जीवन जीने का और चाक दिलो के सीने का

अब आपस के झगड़ों से हमको बच कर आगे बढ़ना है

अब हाथ-हाथ में ले के हमें दिल के बंधन से जुड़ना है

अब माता की सेवा में हमको सर्वस्व समर्पित करना है.

ये एक नयी शुरुआत है...

मां

अक्सर तेरी याद में

आंख मेरी भर आती है

मां! तू मुझे बहुत याद आती है.

तेरी गोद में लेटे हुए

अब महीनों बीत जाते हैं

तुझसे मिलने की आस में

दिन, बरसों की तरह कट पाते हैं.

मां! तेरी डांट खाने को

अब मेरे कान भी तरस जाते हैं

क्यों ये मजबूरियां मुझे तुझसे दूर कर जाती हैं

मां! तू मुझे बहुत याद आती है.