वो बारिश का मौसम, मचलती हवा,
भटकते से हम-तुम चले जा रहे थे.
था भीगा सा तन और बैचैन मन,
दिल में बेताबी ले के चले जा रहे थे.
न तुमने कुछ कहा और न मैंने सुना,
बस वो खामोशियों में ही बतिया रहे थे.
वो मदहोश आलम, वो पागल समां,
थे तो तन्हा, मगर हम चले जा रहे थे.
वो बारिश में गिरकर सम्भलना तेरा,
वो मौसम की रुत सा मचलना तेरा.
वो हिरनी सी आंखें, वो चंचल अदा,
इन्हें साथ ले कर चले जा रहे हैं.
टूटी मदहोशी तो फिर ग़ुमान ये हुआ,
हम थे तन्हा और आंसू बहे जा रहे थे.
न बरिश का मौसम, न मचलती हवा,
तेरी यादों में गुम से हुए जा रहे हैं.
तेरे बिन अब न कुछ भी बाकी रहा,
अब न जाने कैसे हम जिये जा रहे हैं.
है मुझे ये पता, तू यहाँ पर नहीं है,
फिर भी दिल कह रहा ‘तू यहीं है, यहीं है.’
दिल की बेताबियों की सुने जा रहे हैं,
बस तुझे सोच कर ही जिये जा रहे हैं.
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