स्त्री धरती की तरह होती है, शांत, स्थिर मगर उसके भीतर क्या है, ये उसका कोई करीबी भी नहीं बता सकता है. सच है ना.
मैं भी मिला था एक बहुत खास स्त्री से. वो भी तो धरती की तरह ही थी. बिल्कुल शांत. मगर क्या ये ज्ञातव्य नहीं है कि कभी कभी धरती में भी भूचाल आता है. बस यही बात तो थी उसमें. वो थी तो धरती मगर भूचाल के बाद की धरती. शांत, मगर अस्त-व्यस्त. फिर भी कुछ तो बात थी उसमें जो मेरी नज़र उस पर अटक गई. ना जाने क्यूं उस भूचाल के बाद वाली धरती के साथ ही रह जाने को दिल कर रहा था. मगर ऐसा नहीं है के ये पहली नज़र में ही हो गया था. पहली नज़र में तो मुझे लगा था आखिर ये मुझे क्यूं मिली. आखिर यही मुझे क्यूं मिली. शांत ज़रूर थी वो मगर केवल बाहर से. भीतर तो अभी भी लावा भरा था. गर्म लावा, जो सब कुछ खत्म कर देना चाहता था. जैसे जीवन उसे पसंद ही नहीं था. जैसे नफरत हो गई थी उसे ज़िंदगी से. जैसे कुछ मिला जुला रूप हो, दर्द, गुस्से और डर का. हाँ ऐसी ही तो थी वो. फिर मैं उसे मिला, या कहो वो मुझे मिली. एक ही बात लगती है ना, मगर ये दोनो अलग अलग बातें हैं. हालांकि पसंद हम दोनो ही एक दूसरे को नहीं करते थे, मगर कुछ तो बात थी जो हम दोनों को जोडती थी, और वो थी हमारा काम. सुनकर हास्यस्पद लगता है, मगर आखिर इसी वजह से तो हम एक दूसरे को जान सके. यही तो वो तंतु था जो हम दोनों में तारतम्य बनाता था. बस इसी बहाने से धीरे-धीरे हम करीब आ रहे थे. बहुत करीब, इतना करीब, कि अब लगता था कि शायद हमें तो मिलना ही था. कुछ तो हो रहा था हमें. या कहूं मुझे. क्युंकि फिलहाल मैं उसके दिल की बात नहीं जानता था. अभी तो बस लग रहा था कि बस हम इसी तरह मिलते रहें,बस यूं ही, दिन भर, देखता रहूँ मैं उसे, बैठे हुए. मगर वो तो मुझे अब भी बच्चा समझती थी. और हाँ शुरुआत में ये सब बचपना ही तो था. हमारे रिश्ते कि शुरुआत तो दोस्ती से ही हुई थी ना. एक नादान सी दोस्ती. बिना किसी मतलब के. ना दुनिया का डर, और ना एक दूसरे का. मगर लोगों को कहाँ पसंद आती है ऐसी दोस्ती. बस वहीं से हमारे बीच तकरार कराने की कोशिशें तेज हो गईं. ऐसी दोस्तियां खास तौर पर कुछ खास उम्र पार कर चुकी औरतों को पसंद नहीं आती हैं. खैर फिर भी हमारी दोस्ती टूट ना सकी. वरन और करीब आते गये हम एक दूसरे के.
कुछ वक़्त और गुज़रा और मेरे जाने का वक़्त करीब आने लगा. मगर शायद वो बेखबर थी, मेरी मुहब्बत से, और मेरी भावनाओं से. मैंने कई बार उसे इशारों में वो सब कहना चाहा, जो लब्जों मे कहने मे शायद सालों लग जाते. मगर वो तो बेखबर थी. जाने कुछ समझना नहीं चाहती थी या कुछ समझ नहीं पा रही थी. आखिर ऐसा क्यूं था कि हमारा इतना गहरा रिश्ता होते हुए भी वो मुझे नहीं समझ पा रही थी. खैर आखिर बडी कोशिशों के बाद, मैंने उसे समझा ही दिया. मगर जवाब में मिली उसकी हंसी ने मेरे होश-ओ-हवास उडा दिये. वो हंसी, जोर से, बहुत जोर से, फिर अचानक चुप हो गई. पूछ्ने लगी, क्या ये वाकई सच है? अगर ये सच है तो मुझे बताओ कि ये कैसे हुआ और क्यूं हुआ...? कुछ देर बाद वो बोली, “सुनो, मैं तुम्हारी बात समझ सकती हूँ, मगर मुझे ये भी पता है कि तुम भी मेरी बात समझोगे. ये किसी भी तरह सम्भव नहीं है. तुम मुझसे छोटे हो, और मैंने तो इस बारे में कभी सोचा भी नहीं था कि ऐसा कुछ हो सकता है.”
अब भला उसे कैसे बतलाता, और समझाता, कि प्यार किसी का इंतज़ार नहीं करता है. ये कोई वजह भी नहीं पूछ्ता है. ये तो बस हो जाता है. काफी दिन बस यूं ही गुजर गये, उसकी हाँ के इंतज़ार में. हालांकि उसने पहले ही कह दिया था, कि वो नहीं चाहती. मगर फिर भी मुझे इंतज़ार था. उसका, और उसकी हाँ का. वक़्त बस यूं ही बीत रहा था. अचानक उसे किसी काम से एक छोटे गांव जाना पडा. गांव तो क्या एक कस्बा था. एक दिन का काम कुछ ज्यादा ही खिंच गया, और उसे वहीं रुकना पड गया. अब रुकने की जगह तो कोई खास थी नहीं उस गांव में, अलबत्ता एक छोटा सा होटल मिल गया. उस रात ना जाने क्यूं मेरा दिल भी बडा बैचैन था. कुछ सूझ ही नहीं रहा था. सोच रहा था, तो बस उसी के बारे में, ना जाने कैसी होगी, कुछ खाया भी होगा या नहीं, और भी ना जाने क्या-क्या. अचानक मेरा मोबाईल बजा, ये उसी का काल था. वो रो रही थी और मेरा दिल बैठा जा रहा था, आखिर क्यूं मैंने उसे अकेला जाने दिया. कुछ पल तो मुझे कुछ महसूस ही नही हुआ. फिर वो बोली उसे डर लग रहा है. तब मेरी जान में जान आई. वो बोली ऐसे में उसे केवल मेरा ही खयाल आया. ना जाने क्यूं ऐसे हालात में भी मुझे खुशी महसूस होने लगी. लगा शायद वो भी मेरे बारे में कुछ वैसा ही सोचती हो. मगर शायद ये मेरा वहम ही था. फिर जैसा मैंने शुरू में ही कहा, औरत धरती की तरह होती है. ऊपर से तो वो भी बडी मजबूत थी, मगर भीतर कहीं कुछ उसके मन में उथल पुथल थी, कोई डर, असुरक्षा, एक अनजाना भरम. उस रात हम दोनों ने तब तक बात की जब तक वो सो नहीं गई. हालांकि मैं ये जानता हूँ कि आज के युवाओं के लिये रात भर बातें करना कोई हैरत की बात नहीं है, मगर मेरे लिये वो थी. क्यूंकि मुझे फोन पर बात करने के मुक़ाबले सामने बैठ कर चुप रहना ज्यादा पसंद है.
खैर वो वक़्त भी गुज़र गया. अब वक़्त आ रहा था मेरे जाने का. लग रहा था, जैसे इस बादल को अब कहीं धरती नसीब ना हो सकेगी, जैसे इस पेढ की जडें काट दी जा रहीं हों, जैसे इस पवन को इसके आधार से हटाया जा रहा हो, जैसे इस आकाश का सम्पर्क काटा जा रहा हो इसकी धरती से. मगर मैं चला गया, उससे दूर, बहुत दूर. फिर भी मुझे आज भी मेरी ज़मीन का इंतज़ार है. इंतज़ार है उसका, वो आये और समेट ले अपने आंचल में मुझे, सर्वस्व, सम्पूर्ण, कुछ ऐसे जैसे मिल जाता है बादल ज़मीन से, किसी बारिश के बाद. कुछ इस तरह हम हो जायें एक दूजे के,जैसे हैं ये धरती और आकाश. सदा के लिये.
मगर अब भी ये ख्वाब मेरे ख्वाब ही हैं. अब भी मैं ये सोचता हूँ, “काश..! ऐसा हो जाये. मैं तुझसे मिल जाऊं, तू मुझसे मिल जाये.”
No comments:
Post a Comment